
Ms. Usha Chhabra (Rex Karmaveer awardee, an educator, an author and a storyteller) has taught Hindi for 24 years at Delhi Public School, Rohini, She has closely observed the many challenges that both teachers and students face while engaging with Hindi. In her long-standing endeavour to make Hindi accessible and appealing, she authored three separate series of textbooks in Hindi as well as published a couple of poetry books with an attached audio CD. Her conviction to tackle this issue led her beyond the confines of her school, as she ventured into conducting storytelling sessions, teachers’ and parents’ orientation programmes and workshops for children on creative writing and dramatics across India. She has taken sessions at the World Book Fair, Nehru Memorial Museum and Library, National Museum, National Bal Bhawan, Rajiv Gandhi Foundation, Kiran Nadar Museum of Art, Dilli Haat (INA & Janakpuri), various NGO’s and many schools across India. She was also part of the Jaipur Literature Festival Outreach Programme, Bhiwani Children Literature Festival, Kanpur Literature Festival, Katha Karnival Katha Utsav and Gwalior Art and Literature Festival.To keep up in this digital age, and especially in the current times, she has conducted numerous online sessions, and updated her channel on YouTube, which is a repository for teachers, parents and kids facing challenges in learning Hindi, be it grammar, book chapters, storytelling or poetry recitation. She also designed capsule courses for teaching Hindi to non-Hindi speakers and for students of Indian origin in Singapore, the UK and the USA. In addition, she has scripted stage shows for Natya Ballet Centre and NTPC, a cultural programme in the Vishva Hindi Sammelan held in Bhopal (2015) and in Mauritius (2018).
The World This Week team celebrates her work in this two part series. This week we talk to Usha, the teacher, and next week we share her insights about Hindi and her work in advocating Hindi and making it popular to children and adults alike.
प्रश्न- उषा छाबड़ा मैम, आप अपने बारे में कृपया बताएँ।
उत्तर – मेरा जन्म कलकत्ते में हुआ और पढाई कलकत्ते और गुवाहाटी में हुई। शादी के बाद मैं दिल्ली आ गई। मैं पिछले पच्चीस वर्षों से हिंदी भाषा के अध्यापन के साथ -साथ साहित्य-सेवा करती रही हूँ और बच्चों को कहानियाँ भी सुना रही हूँ । बच्चों को कहानियाँ सुनाना मुझे बेहद पसंद है। मैंने कक्षा नर्सरी से कक्षा आठवीं तक के स्तर के बच्चों के लिए पाठ्य पुस्तकें एवं व्याकरण की पुस्तक श्रृंखला भी लिखी है। मैं बच्चों, अभिभावकों एवं शिक्षकों के लिए वर्कशॉप लेती रहती हूँ। मेरी कई कहानियाँ भी विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। इन दिनों मैं देश-विदेश के अहिन्दी भाषी बच्चों और बड़ों को भी हिंदी पढ़ना और बोलना सिखा रही हूँ। मेरा अपना यू-ट्यूब चैनल भी है जिसमें मैंने हिंदी मात्राएँ, मुहावरे, दोहे, कहानियाँ, कविताएँ, लेखकों के साक्षात्कार आदि कई वीडिओ डाले हैं। सभी इसका लाभ उठा सकते हैं।
प्रश्न- हमारे जीवन में कहानियाँ सुनाने का क्या महत्त्व है? कृपया बताएँ।
उत्तर – कहानियाँ हम सबके जीवन का हिस्सा हैं। हम सभी बचपन से ही कहानियाँ सुनते और गढ़ते आए हैं। कहानियाँ हमारी कल्पना को पंख देती हैं। हम कहानियों में जाने कहाँ-कहाँ पहुँच जाते हैं। कहानियाँ हमारे अनसुलझे प्रश्नों का हल देती हैं, हमें सुकून पहुँचाती हैं। हम कहानी के पात्रों से आत्मीय सम्बन्ध बना लेते हैं। कहानियाँ हमें दूसरों की ज़िंदगी को नज़दीक से जानने का अवसर प्रदान करती हैं एवं हमें एक दूसरे से जोड़ती हैं। घर में बड़े-बुज़ुर्गों के पास कहानियों एवं अपने अनुभवों का खज़ाना होता है। जब वे कहानियाँ सुनाते हैं तो हमें अपने परिवार के लोगों के बारे में, समाज के बारे में बहुत कुछ पता चलता है। देश-विदेश की कहानियाँ मनोरंजन के अलावा हमें वहाँ की संस्कृति से भी अवगत कराती हैं। इससे बच्चों की रचनात्मक और सृजनात्मक कौशल का विकास भी होता है। कहानियाँ सुनने से एकाग्रचित्तता बढ़ती है और जाने-अनजाने कई तथ्यों का भी आदान-प्रदान हो जाता है। किसी भी विषय को रोचक ढंग से प्रस्तुत करने के लिए भी कहानियों का सहारा लिया जाता है।
Continuing our conversation with Usha Chhabra, The World This Week team celebrates her work in promoting Hindi through her stories and more. This week we talk to Usha, the advocate for Hindi language on how to make it popular with children and adults alike.
प्रश्न– हिंदी हमारी राजभाषा है, फिर भी इसकी पहचान कहीं खो-सी रही है। इसे लोकप्रिय बनाने के लिए क्या प्रयास किए जा सकते हैं ?
उत्तर – अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल होने की वजह से बच्चे अधिकतर सभी विषय अंग्रेज़ी में पढ़ते हैं जिसकी वजह से उनका हिंदी से संपर्क टूट-सा जाता है। अभिभावकों को लगता है कि रोज़गार के लिए तो अंग्रेज़ी अच्छे से आनी चाहिए। इसलिए हिंदी को छोड़, वे अंग्रेज़ी की ओर आकर्षित हो जाते हैं। वैसे ऐसा भी नहीं है कि हिंदी का प्रयोग कम हो रहा है। आज कितने ही सीरियल, कितने ही चैनल, कितनी ही फिल्में, कितने ही विज्ञापन हिंदी में बन रहे हैं। विदेश में बहुत से लोग हिंदी पढ़ने को आतुर हैं। हिंदी अगर रोचक ढंग से पढ़ाई जाए, तो अवश्य ही बच्चों का भी इस ओर रुझान बढ़ेगा। कई घरों में हिंदी की पत्रिकाएँ, हिंदी के समाचार-पत्र नहीं आते। अगर हम इन्हें घर पर मँगाते हैं, हिंदी की किताबें खरीदकर पढ़ते हैं, तो निश्चय ही लोगों को हिंदी अच्छी लगने लगेगी। बच्चों का पुस्तकों से रिश्ता जोड़ना होगा। उसके लिए उनके नाम से पत्रिकाएँ मंगवाएँ, किताबें मँगवाएँ, जिससे कि बच्चों को लगेगा कि ये पत्रिकाएँ उनकी अपनी हैं। वे उस पत्रिका से जुड़ जाएँगे, उसके आने का इंतज़ार करेंगे। यही जुड़ाव आगे जाकर काम आता है। विद्यालयों में भी हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों को महत्त्व दिया जाए, तभी इस ओर लोग ध्यान देंगे। अंग्रेज़ी एक अंतरराष्ट्रीय भाषा है, इसके महत्त्व को झुठलाया नहीं जा सकता, लेकिन अपनी भाषा को छोड़ना नहीं चाहिए। हिंदी को साथ लेकर चलना अच्छा है। वैसे भी हमें अधिक से अधिक भाषाएँ सीखनी चाहिए। अगर सब मिल-जुलकर प्रयास करेंगे तो अवश्य ही हिंदी लोकप्रिय हो जाएगी।
प्रश्न– क्या एक दिन हिंदी उत्सव मना लेना काफ़ी होगा? बच्चे अधिकतर हिंदी की किताबें एवं कहानियाँ पढ़ना पसंद नहीं करते, इस सोच को बदलने के लिए क्या करना होगा?
उत्तर– हिंदी या किसी भी भाषा के उत्थान के लिए एक दिवस पर्याप्त नहीं होता। किसी भी भाषा को लोकप्रिय बनाना है, तो उसे प्रतिदिन की दिनचर्या में उसे शामिल करना होगा। बचपन से ही बच्चों को हिंदी की मनोरंजक कविताएँ एवं कहानियां सुनाई जाएँ, तो बच्चे हिंदी का प्रयोग करने लगेंगे। जितना ज़्यादा हम किसी भाषा का प्रयोग करते हैं, उतना हमें उसे लिखने और पढ़ने में आसानी लगती है। आज बच्चों को हिंदी कठिन लगने लगी है क्योंकि उससे दूरी बढ़ती जा रही है। शिक्षक-गण भी अपने शिक्षण में रोचक गतिविधियाँ शामिल करें,तो बच्चों की इस ओर रूचि बढ़ेगी। अभिभावकों को भी अपनी मानसिकता बदलनी होगी। बच्चों से हिंदी में भी बात-चीत करनी होगी। वे बच्चे के साथ कहानियाँ साझा करें, हिंदी का समाचार-पत्र पढ़ें। लेखक भी आज की पीढ़ी के अनुसार समसामयिक कहानियाँ लिखें। उनकी भाषा रुचिकर हो, बोझिल नहीं। प्रकाशक भी अच्छी किताबें छापें, जिनमें आकर्षक चित्र हों, तो बच्चों को किताबें अवश्य पसंद आएँगीं।
प्रश्न– आप तरह-तरह के कार्यों के लिए जानी जाती हैं। आपको कौन-सा कार्य सबसे प्रिय है?
उत्तर -मैं इतने वर्षो से हिंदी पढ़ाती रही और साथ-साथ ही कहानियाँ भी सुनाती रही। भाषा की अध्यापिका होने के कारण कहानियाँ हमेशा ही मेरे अध्यापन का हिस्सा रहीं। मेरे अंदर के कहानीकार को अध्यापन का साथ मिला। मैंने देखा कि बच्चे उससे बहुत आसानी से जुड़ जाते और मेरा काम बहुत आसान हो जाता। बच्चे मुझसे झट घुल-मिल जाते थे। मुझे ये दोनों ही कार्य बहुत पसंद हैं।
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